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चकली दिवस: नवसारी में पिछले 40 वर्षों में चकली की संख्या में लगभग 80 प्रतिशत से अधिक कमी आई है।

20 मार्च को विश्व चकली दिवस के रूप में मनाया जाता है। भूतकाल में, चकली को एक तरह से मानव जीवन से जुड़ा हुआ पक्षी माना जाता था।

गाँवों के अलावा शहरों में भी कई घरों में चकली आती-जाती थी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में क्रमशः स्थिति बदली है और चकली के अस्तित्व को भी खतरा पैदा होने लगा है।

पक्षी विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र देसाई बताते हैं कि, 'पुराने वर्षों में तो लोगों के घर भारट वाले थे, जहां चकली अपने घोंसले बनाती थी। भारट में पूठा रखा जाता था, जो चकली के घोंसले के लिए अनुकूल रहता था।

अब घरों में भारट नहीं है और नई पद्धति के घर बनते हैं, जिनमें चकली के घोंसले के लिए जगह या उपयुक्त स्थान नहीं रहता।

यदि चकली को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए, तो दिक्कत हो सकती है। पिछले 40 वर्षों में, पहले की तुलना में केवल 10 या 20 प्रतिशत चकली ही हम वहाँ देखते हैं। डांग में अब भी झुंड में दिखाई देती हैं।


हमारे यहाँ तो चकली ज़्यादा नहीं दिखती, लेकिन नज़दीकी डांग जिले में, खासकर कालीबेल जैसे इलाकों में, अच्छी संख्या में चकली झुंड में दिखाई देती हैं, ऐसा डॉ. राजेंद्र देसाई कहते हैं। नवसारी जैसे क्षेत्र से अंतर है। एक कारण यह भी हो सकता है कि वहाँ के घरों का प्रकार अलग हो, जिससे पक्षी को रहने लायक जगह मिल सके।

रिपोर्टर, नेहल पटेल